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Wednesday, February 23, 2011

अनकहीं बात..


हम कि ठहरे अजनबी ,
इतनी मतारतों के बाद ,
फिर बनेगे आशना ,
कितनी मुलाकातों के बाद |
थे बहुत बेदर्द लम्हे,
खत्में दर्दे इश्क के ,
थी बहुत बे -महर सुब्हें ,
महरबां रातों के बाद |
दिल तो चाहा पर,
शिकस्ते दिल ने मोहलत ही न दी ,
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते ,
मुनाजातों के बाद |
उनसे जो कहने गये थे ,
फैज जा सदका किये ,
अनकहीं ही रह गई वो बात ,
सब बातो के बाद |

Sunday, February 13, 2011

यह वही दिन है ..

यह वही दिन है ....
जो किसी सूर्योदय से, संभव नहीं हुआ |
जो किसी निशांत के बाद ,
आया अपने क्रम से |
यह वही दिन है ...
जो पंखो में थरथराती गर्माहट से उठा ,
और एक चिड़िया के गान से ,
जिसका जन्म हुआ|
यह वही दिन है ....
जो पंचाग में आया प्रेम कि तिथि पर ,
शब्दों के आकाश में जिसकी सिंदूरी आभा ,
छायी रही देर तक |
जिसके लिए रात सिर्फ अँधेरी चादर थी ,
कुछ देर ओढ़कर निस्पंद रहने के लिए |
यह वही दिन है ....
जब उसने कुछ कहा ,जब उसने कुछ सुना,
और सब कुछ खिल गया |
खुला -खुला सा , समय के वृत पर |
यह वही दिन है ....
जो अपने अन्त पर आरम्भ है |




Saturday, February 12, 2011

'तन्हा'..

हंसी थमी है इन आँखों में नमी कि तरह ,
महकती थी गुलशन में जो कली कि तरह |
यूँ तो कोई आता नहीं , इस वीरान चमन में ,
ये किसकी परछाई है , कुछ मेरी ही तरह |
यूँ तो दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है ,
पर यादें भी कड़वा सच हे ,जिन्दगी कि तरह |
वो आया और चला गया सब कुछ लेकर ,
लिपटी रह गई रूह बदन पर अजनबी कि तरह|
किसे ढूंढती है इस दुनिया -ए -दश्त में 'तन्हा',
कोई साथी हो तेरा भी , खामोशी कि तरह |

Saturday, February 5, 2011

विश्वास बहुत है..

जाने क्यूँ ,तुमसे मिलने कि आशा कम, विश्वास बहुत है|
सहसा भूली याद तुम्हारी उर में आग लगा जाती है ,
विरह ताप भी मधुर मिलन के सोये मेघ जगा जाती हें ,
मुझको आग और पानी में रहने का अभ्यास बहुत है |
जाने क्यूँ ,तुमसे मिलने कि आशा कम, विश्वास बहुत है|
धन्य धन्य मेरी लघुता को , जिसने तुम्हें महान बनाया ,
धन्य तुम्हारी स्नेह कृपणता ,जिसने मुझे उदार बनाया,
मेरी अंध भक्ति को केवल इतना मंद प्रकाश बहुत है |
जाने क्यूँ ,तुमसे मिलने कि आशा कम, विश्वास बहुत है |

Friday, December 31, 2010

पुकार..

इस समय ..........
जो भी कहीं भी ,
किसी को भी पुकारता है ..
मेरी ओर से तुम्हें पुकारता हैं |
अपनी कविता के सुनसान में बैठा कवि,
फूलों कि चकाचोंध से दब गयी पत्तियां ,
आधी रात को रेगिस्तान में आया अंधड़ ,
बरसता बादल.......
मंदिर मे अकेला ईश्वर ....
सब .....मेरी और से तुम्हें पुकारते हैं |

Thursday, October 21, 2010

दुविधा ..




ये क्या दस्तूर है,ये कैसे नजराने मिले है|
जब भी मोड़ आया , नए हमराही मिले है |
या खुदा ये तेरी खुदाई है कैसा खेल ,
शिकस्त के आसार थे जहाँ
वहां फतह के नजराने मिले है |
मै तो हैरान थी की प्यार का दस्तूर ना निभाया ,
तुने ऐसे करिश्मे दिखाएँ की ,
जो मिले प्यार के दीवाने मिले है |
अभी फलक पर मेरी जीत बाकी है,
अभी नूर की सूरत देखनी बाकी है |
पर तू कहां कम है ?
जब जब लगा अब मंजिल करीब है ,
तब -तब मुझे ,
रुकने के बहाने मिले है ||

Sunday, October 3, 2010

आज फिर..


तन्हा तन्हा, खोई खोई,मै और मेरी परछाई..
आज फिर दस्तूर निभाया सबने ,
आज फिर यादें घिर आयी
आज फिर बादें-सबां हुआ रोशन ,
आज फिर बहार चली आई
तन्हा तन्हा, खोई खोई ,मै और मेरी परछाई
आज फिर धड़कन बनी चंचल , आज फिर लफ्जों में गहराई
आज फिर मुस्कुराहट बनी बोझल आज फिर हँसतें- हँसते आँख भर आई
तन्हा तन्हा, खोई खोई ,मै और मेरी परछाई
आज फिर कसम खामोशी की, आज फिर मंजिल दूर नजर आई
आज फिर नव आस मै मन ,आज फिर आहट किसी की आई
तन्हा तन्हा, खोई खोई ,मै और मेरी परछाई

Sunday, August 15, 2010

क्या जिन्दगी इसी को कहते है दोस्त..............


जिन्दगी - मेरी डायरी के पन्नो से - मेरे शब्दों में .............
मुझे उम्मीद थी एक जवाब की
मुझे एक बेहूदा सा सवाल मिला है
क्या जिन्दगी इसी को कहते है दोस्त ,
जब दिल ने चाहा , जीना
तब ही मौत का पैगाम मिला है
मुझे तलाश थी एक हंसी दुश्मन की
मुझे हर कदम दोस्ती का नजराना मिला है
क्या हकीकत यही है प्यार की दोस्त ,
जब दिल ने चाहा, मिलन
तब ही जुदाई का फरमान मिला है
मुझे चाहत थी गुमशुदा होने की
मुझे हर दौर में चर्चा-ए-आम मिला है
क्या बंदगी इसी को कहते है दोस्त,
जब दिल ने चाहा, वीराना
तब ही रौनके-ए-महफ़िल का नाम मिला है l

Thursday, August 12, 2010

कहाँ है चांदनी ?


तुम वहीं रह गए
उसे देखो

वह कहां से कहां पहुँच गई

घर की छत पर,
खिडकियों से भीतर ,
परदों के पार,
मखमली घास पर
कहां नहीं है उसकी गमक
कहाँ नहीं है उसकी ठंडक

नदी के मुहाने पर
खलिहान के निकट
चौपाल के गट्टे पर
सड़क के किनारे
रेट के कणों मे
पर्वत के पेड़ पर
कहाँ नहीं है उसकी गमक
कहां नहीं है उसकी महक

तुम ?
क्या है तुम्हारें पास ?
केवल विराट शून्य भरा एक
आकाश ?
तुम वहीं रह गए चाँद
देखो , कहाँ - कहाँ पहुँच गई
तुम्हारी चांदनी

Saturday, July 31, 2010

दोस्ती को परिभाषित करने की कोशिश ,,,,,,एक रचना मेरी डायरी से,,,,,,,,,


दोस्ती एक रिश्ता भी है हमराही के प्यार का ,
दोस्ती एक नाम भी है ,अजनबी के विश्वास का ,
दोस्ती एक सलीका भी है अंजानो से व्यव्हार का ,
दोस्ती एक रंग भी है सावन की बहार का
दोस्ती एक फूल भी है उस बाग के गुलाब का
दोस्ती एक धोखा भी है मिलन के खुमार का
दोस्ती एक टकरार भी है ,संगम पानी और आग का
दोस्ती एक आधार भी है , हर रिश्ते की शुरुआत का
हैं एक अनमोल बंधन इस संसार का ...................

Sunday, July 25, 2010

क्षितिज


कौन कहता है की जमीं से आसमां नहीं मिलता
जब जमी से उठता है बादल तो क्या उसे हवा का साथ नहीं मिलता
जब बरसता है आसमां तो क्या उसे बहारो का दामन नहीं मिलता
बेशक मीलो है दरम्या , मगर गौर से देखो
तो क्या क्षितिज पर मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता