Sunday, May 22, 2011

तुम बिन...


तुम बिन ज़िन्दगी है सूनी।
बर्फ के चादर सी ठंडी,
खुशियां विहीन,
निष्पन्द, निश्क्रिय
जो गम के धूप से पिघलती
आंसू, गम, दर्द समेटे
सुख ,चैन, शांति गर्त में दबाये
बेजान सी पड़ी है।
काली घाटाओं की तरह,
मन की व्यथा,
नयनों के नीर
आकुल हैं
बरसने के लिये।
पल पल सालता है
चुभता है रीतापन।
ये सूनी रातें,
ये खाली दिन।
कठिन है, कठिन है
जीना तुम्हारे बिन।

Wednesday, May 4, 2011

बरसों के बाद देखा..


बरसों के बाद देखा इक शख्स दिलरुबा सा
अभी जहन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू
खिंचे खिंचे से आखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहज़ा थका थका सा

अलफाज़ थे के जुगनु आवाज़ के सफ़र में

बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा


ख़्वाबों में ख़्वाब उसके यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िंदगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बत्तों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्द्तों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूं हुआ के सावन आंखो में आ बसे थे
फिर यूं हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारों हम को खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़या ज़रा सा

तेवर थे बेरूखी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

हम दश्त थे के दरिया, हम ज़हर थे के अमृत
नाहक था ज़ोनुम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उसको देखा कल शाम इत्तेफाक़न
अपना भी हाल है अब लोगों 'फराज़' का सा

Sunday, March 6, 2011

दूर तक छाये थे बादल..

दूर तक छाये थे बादल,

पर कहीं साया न था|

इस तरह बरसात का मौसम

कभी आया न था |

क्या मिला आख़िर ,

तुझे सायों के पीछे भाग कर |

ऐ दिले-नादाँ,

तुझे क्या हमने समझाया न था |

उफ़ ये सन्नाटा की आहट तक न हो,

जिसमें मुखिल,

ज़िन्दगी में इस कदर,

जमने सुकूँ पाया न था |

खूब रोये छुपके घर की चारदीवारी में हम,

हाले-दिल कहने के क़ाबिल कोई हमसाया न था |

हो गए कल्लाश जबसे आस की दौलत लुटी,

पास अपने और तो कोई भी सरमाया न था|

सिर्फ़ खुशबू की कमी थी गौर के क़ाबिल 'क़तील',

वरना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था |


Wednesday, February 23, 2011

अनकहीं बात..


हम कि ठहरे अजनबी ,
इतनी मतारतों के बाद ,
फिर बनेगे आशना ,
कितनी मुलाकातों के बाद |
थे बहुत बेदर्द लम्हे,
खत्में दर्दे इश्क के ,
थी बहुत बे -महर सुब्हें ,
महरबां रातों के बाद |
दिल तो चाहा पर,
शिकस्ते दिल ने मोहलत ही न दी ,
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते ,
मुनाजातों के बाद |
उनसे जो कहने गये थे ,
फैज जा सदका किये ,
अनकहीं ही रह गई वो बात ,
सब बातो के बाद |

Sunday, February 13, 2011

यह वही दिन है ..

यह वही दिन है ....
जो किसी सूर्योदय से, संभव नहीं हुआ |
जो किसी निशांत के बाद ,
आया अपने क्रम से |
यह वही दिन है ...
जो पंखो में थरथराती गर्माहट से उठा ,
और एक चिड़िया के गान से ,
जिसका जन्म हुआ|
यह वही दिन है ....
जो पंचाग में आया प्रेम कि तिथि पर ,
शब्दों के आकाश में जिसकी सिंदूरी आभा ,
छायी रही देर तक |
जिसके लिए रात सिर्फ अँधेरी चादर थी ,
कुछ देर ओढ़कर निस्पंद रहने के लिए |
यह वही दिन है ....
जब उसने कुछ कहा ,जब उसने कुछ सुना,
और सब कुछ खिल गया |
खुला -खुला सा , समय के वृत पर |
यह वही दिन है ....
जो अपने अन्त पर आरम्भ है |




Saturday, February 12, 2011

'तन्हा'..

हंसी थमी है इन आँखों में नमी कि तरह ,
महकती थी गुलशन में जो कली कि तरह |
यूँ तो कोई आता नहीं , इस वीरान चमन में ,
ये किसकी परछाई है , कुछ मेरी ही तरह |
यूँ तो दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है ,
पर यादें भी कड़वा सच हे ,जिन्दगी कि तरह |
वो आया और चला गया सब कुछ लेकर ,
लिपटी रह गई रूह बदन पर अजनबी कि तरह|
किसे ढूंढती है इस दुनिया -ए -दश्त में 'तन्हा',
कोई साथी हो तेरा भी , खामोशी कि तरह |

Thursday, February 10, 2011

जो चल सको तो चलो..

सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
इधर उधर कई मंजिलें हैं जो चल सको तो चलो
बने बनाये हैं सांचे जो ढल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराकर अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है ज़िन्दगी कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
हर एक सफर को है महफूज़ रास्तों की तलाश
हिफज़तों की रवायत बदल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज धुआं धुआं है फिजा
ख़ुद अपने आप से बहार निकल सको तो चलो..

Saturday, February 5, 2011

विश्वास बहुत है..

जाने क्यूँ ,तुमसे मिलने कि आशा कम, विश्वास बहुत है|
सहसा भूली याद तुम्हारी उर में आग लगा जाती है ,
विरह ताप भी मधुर मिलन के सोये मेघ जगा जाती हें ,
मुझको आग और पानी में रहने का अभ्यास बहुत है |
जाने क्यूँ ,तुमसे मिलने कि आशा कम, विश्वास बहुत है|
धन्य धन्य मेरी लघुता को , जिसने तुम्हें महान बनाया ,
धन्य तुम्हारी स्नेह कृपणता ,जिसने मुझे उदार बनाया,
मेरी अंध भक्ति को केवल इतना मंद प्रकाश बहुत है |
जाने क्यूँ ,तुमसे मिलने कि आशा कम, विश्वास बहुत है |

Friday, December 31, 2010

पुकार..

इस समय ..........
जो भी कहीं भी ,
किसी को भी पुकारता है ..
मेरी ओर से तुम्हें पुकारता हैं |
अपनी कविता के सुनसान में बैठा कवि,
फूलों कि चकाचोंध से दब गयी पत्तियां ,
आधी रात को रेगिस्तान में आया अंधड़ ,
बरसता बादल.......
मंदिर मे अकेला ईश्वर ....
सब .....मेरी और से तुम्हें पुकारते हैं |

Friday, November 12, 2010

प्रतीक्षा...


मैंने नहीं किया तुमसे कभी
किसी बात पर गिला शिकवा
ना कभी खाई कोई कसम
और ना ही बाध्य किया तुम्हे !
मैंने मचलकर , कभी नहीं कि ,
किसी जिद्दी बच्चे सी कोई ख्वाहिश ,
ना ही कभी जताया ,
तुम पर अपना अधिकार ,
मैंने कभी नहीं कहा तुमसे ,
कि बहुत दुखता है मुझे ,
तुम्हारा दिया हुआ कोई भी जख्म,
ना कभी कि कोशिश ,
कि बांध लू तुम्हारे बहाव को !
मैंने कभी नहीं बाँधा तुम्हे ,
संबोधन कि डोर से ,
ना ही अपने रिश्ते को ,
दिया कोई नाम |
मै बस खडी रही सदियों से मौन |
यो ही प्रतीक्षारत ,
अपने विश्वास कि बाँहे फैलाये |
तुम्हारी रहगुजर पर
कि किसी दिन तो आओगे तुम ,
और आकर ,उड़ेल दोगे मेरी झोली में ,
सारे जहाँ कि खुशियाँ |

Thursday, November 4, 2010

ओ अज्ञात..


कब तक छिपे रहोगे ओ अज्ञात |
इस अजनबी दुनिया की भीड़ में,
बार बार मुझसे मेरे मन ने ,
जिज्ञासा से , उत्कंठा से ,
लालसा से पूछा है , वो कौन है अज्ञात ?
मै तो सिर्फ इतना जानती हूँ ,
अक्सर, जब मैंने
वेणी गुथतें गुथतें , दर्पण में स्वयं को देखा है ,
फूल को जब सही जगह टांका है ,
काजल से जब भी आंची है आँखे ,
मेरी आँखों में मुस्काएं हो तुम
मेरे कंठ से बन गीत गुनगुनाए हो तुम |
एक ताजी हवां का झोका बन , चोरी से आये हो तुम |
और छूकर वेणी फूलों की ,
पूरे घर में खुशबू बन के महके हो तुम |

ऐसे ही कुछ और क्षणों में ...
आगमन हुआ है तुम्हारा |
जब भी प्रज्ज्वलित किया है दीपक,
उसकी लौ में प्रकाश पुंज ढला है हर बार ,
तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब |
पूजन वंदन में जब जब,
प्रभू मूरत के सामने मूंदी है आँखे ,
तो हर बार ऐसा लगा है ,
कि मेरी बायीं तरफ ,
आँखें मूंदे बैठे हो तुम |
खोलते ही आँखे न जाने कहाँ
छिप जाते हो तुम |
कब तक छिपे रहोगे ओ अज्ञात |
इस अजनबी दुनिया कि भीड़ में ....

Wednesday, October 27, 2010

जिन्दगी.


जिन्दगी ऐसे हर लम्हा ढलती रही,
रेट मुट्ठी से जैसे फिसलती रही |
दिन थका मांदा एक और सोता रहा ,
रात बिस्तर पर करवट बदलती रही |
कह ना पाया जुबां से वो कुछ आज भी ,
आँख में दिल की दुनिया मचलती रही|
जहाँ की पटरियों पर तेरी याद की ,
रेल हर शाम रुक रुक कर चलती रही |
आग में तप के सोना निखरता रहा ,
जिन्दगी ठोकरों मै संभलती रही |
शहर में नफरतों की हवा थी मगर ,
प्यार की शम्मा बेखोफ जलती रही |
किस तरह हो भरोसा आप पर ,
हर कदम दोस्ती मुझको छलती रही |

Thursday, October 21, 2010

दुविधा ..




ये क्या दस्तूर है,ये कैसे नजराने मिले है|
जब भी मोड़ आया , नए हमराही मिले है |
या खुदा ये तेरी खुदाई है कैसा खेल ,
शिकस्त के आसार थे जहाँ
वहां फतह के नजराने मिले है |
मै तो हैरान थी की प्यार का दस्तूर ना निभाया ,
तुने ऐसे करिश्मे दिखाएँ की ,
जो मिले प्यार के दीवाने मिले है |
अभी फलक पर मेरी जीत बाकी है,
अभी नूर की सूरत देखनी बाकी है |
पर तू कहां कम है ?
जब जब लगा अब मंजिल करीब है ,
तब -तब मुझे ,
रुकने के बहाने मिले है ||

Wednesday, October 6, 2010

काटों सी चुभती है तन्हाई ..


काटों सी चुभती है तन्हाई
अंगारों सी सुलगती है तन्हाई

कोई आ कर हम दोनों को हंसा दे

मैं रोता हूँ रोने लगती है तन्हाई

जब भी तेरे हिसार से निकलना चाहा

यादों के बीज बोने लगती है तन्हाई

रात के किसी हिस्से में, यह भी बेवफा हो जाती है
मैं नहीं सोता सोने लगती है तन्हाई
तुम से जुदा हो कर इस से ही दिल लगा लिया है
मर सा जाता हूँ जब खोने लगती है तन्हाई

Sunday, October 3, 2010

आज फिर..


तन्हा तन्हा, खोई खोई,मै और मेरी परछाई..
आज फिर दस्तूर निभाया सबने ,
आज फिर यादें घिर आयी
आज फिर बादें-सबां हुआ रोशन ,
आज फिर बहार चली आई
तन्हा तन्हा, खोई खोई ,मै और मेरी परछाई
आज फिर धड़कन बनी चंचल , आज फिर लफ्जों में गहराई
आज फिर मुस्कुराहट बनी बोझल आज फिर हँसतें- हँसते आँख भर आई
तन्हा तन्हा, खोई खोई ,मै और मेरी परछाई
आज फिर कसम खामोशी की, आज फिर मंजिल दूर नजर आई
आज फिर नव आस मै मन ,आज फिर आहट किसी की आई
तन्हा तन्हा, खोई खोई ,मै और मेरी परछाई

Saturday, October 2, 2010

तुम नहीं आयें..


जमाना आ गया रुसवाइयों तक , तुम नहीं आयें
जवानी आ गयी तनहाइयों तक, तुम नहीं आयें
धरा पर थम गयी आंधीं, गगन में कांपती बिजली
घटायें आ गयीं अमराइयों तक ,तुम नहीं आयें
नदी के साथ निर्झर की मिली पाती समंदर को
सतह भी आ गयी , गहराइयों तक , तुम नहीं आये
समापन हो गया तम में सितारों की सभाओ का
उदासी आ गयी अंगड़ाइयों तक, तुम नहीं आये
न शमां है , न परवाने , ये क्या महफ़िल -
की मातम आ गया शहनाइयों तक , तुम नहीं आयें
--

Monday, September 20, 2010

प्यार का पहला ख़त .....................


प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,

लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है।

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।

Wednesday, September 1, 2010

मन से मन का मेल यही है........

मन से मन का मेल यही है ,प्रीत ऐसे ही दिल में पले
राधा ने जब कृष्ण को देखा ,आँखो में सौ दीप जले
होंठो पर ठहरी बातो को, नयनो की भाषा मिले

यूँ ही आँखो आँखो में प्यार की दास्तान बढे
राधा ने जब कृष्ण को देखा दिल में प्रीत के कमल खिले

सुन बंसी की लय कृष्णा की, राधा के दिल का फूल खिले
तेरे मेरे प्यार का गीत बस वैसे प्रीत की डगर चले
राधा ने जब कृष्ण को देखा संगीत प्यार का दिल में पाले

जिस एक राग को जल उठाते दोनो दिलो के दीपक
आज अपने मधुर मिलन में उसी राग का दौर चलेप्यास जो देखी थी उस दिन तेरे मीठे लबो पर
वही मीठी मीठी प्यास अब मेरे दिल में भी पाले
राधा ने जब कृष्णा को देखा मन में सौ दीप जले!!

Monday, August 30, 2010

वो ज़रा भी नहीं बदला, लोगों


बाद मुद्दत उसे देखा, लोगों
वो ज़रा भी नहीं बदला,लोगों

खुश न था मुझसे बिछड़ कर वो भी
उसके चेहरे पे लिखा था लोगों

उसकी आँखें भी कहे देती थीं
रात भर वो भी न सोया, लोगो

अजनबी बन के जो गुजरा है अभी
था किसी वक़्त में अपना, लोगों

दोस्त तो खैर, कोई किस का है
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगों

रात वो दर्द मेरे दिल में उठा
सुबह तक चैन न आया, लोगों

ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें........


ज़िंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें !
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें !!

सुर्ख फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें !
दिन ढले यूं तेरी आवाज़ बुलाती है हमें !!

याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से !
रात के पिछले पहर रोज़ जगाती है हमें !!

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों है !
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें !!